About Maharana Pratap

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Last Updated on August 15, 2022 by kumar Dayanand

                      Maharana Pratap(महाराणा प्रताप)

महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह के पुत्र के रूप में 9 मई 1940 ईस्वी में चित्तौड़ में जन्म लिया | महाराणा प्रताप सिंह के 23 भाई और थे | प्रताप इनमें सबसे बड़े थे | सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार करने के कारण अखबार एक बड़ी भारी फोर्स लेकर मेवाड़ पर चढ़ आया |

Maharana Pratap was born in Chittor on 9 May 1940 AD as the son of Maharaja Udai Singh of Mewar. Maharana Pratap Singh had 23 brothers. Pratap was the eldest. Due to accepting the submission of Emperor Akbar, the paper came upon Mewar about a large heavy force.

राणा उदय सिंह चित्तौड़ से भागकर अरावली पहाड़ पर डेरा डाला और वहां पर धीरे-धीरे उदयपुर नामक राजधानी बनाई | चित्तौड़ के युद्ध के 4 साल बाद महाराणा उदय सिंह का मृत्यु हो गई | राणा प्रताप बचपन से ही बड़े वीर, साहसी और स्वाभिमानी थे | प्रताप का राजतिलक एक 30 वर्ष की उम्र में हुआ |

Rana Udai Singh escaped from Chittor and encamped on the Aravalli mountain and gradually built a capital called Udaipur. Maharana Udai Singh died 4 years after the Battle of Chittor. Rana Pratap was very brave, courageous and self-respecting since childhood. Pratap’s coronation took place at the age of 30.

अकबर के तौर पर अधिकार करने के कारण सारा खजाना चित्तौड़ किले में रह गया था तथा बहुत से राजपूत सैनिक भी अकबर के साथ युद्ध करते हुए मारे गए थे | राणा प्रताप के भाई शक्ति सिंह, जगमाल अकबर की शरण में चले गए |
महाराणा प्रताप अटूट साहसी और वीर थे |

Due to his authority as Akbar, all the treasure remained in the Chittor fort and many Rajput soldiers were also killed while fighting with Akbar. Shakti Singh, brother of Rana Pratap, went to the shelter of Jagmal Akbar.
Maharana Pratap was unwavering and brave.

वे कठिनाइयों से तनिक भी विचलित नहीं हुए | वह हर समय अपनी जन्मभूमि में मेवाड़ को आजाद कराने की धुन में लगे रहते थे |राणा प्रताप ने सभी सरदारों को बुलाया तथा उनमें जोश भरने के लिए निम्न प्रतिज्ञा की मैं चित्तौड़ को जीते भी ना सोने चांदी के बर्तनों की जगह पदों पर भोजन करूंगा, मखमली बिस्तर पर सोने के बदले जमीन पर सोऊंगा, महलों की जगह झोपड़ी में रहूंगा और तब तक मैं अपने बाल नहीं बनवाऊंगा |

They were not distracted at all by difficulties. He was always in the mood to liberate Mewar in his native land. Rana Pratap called all the chieftains and pledged the following to energize them. Instead of sleeping on a velvet bed, I will sleep on the ground, I will stay in a hut instead of palaces and till then I will not get my hair done.

Maharana Pratap

इस प्रतिज्ञा को प्रताप ने मरते दम तक निभाया सरदारों की सहमति बनने पर प्रताप ने अकबर से युद्ध करने की तैयारियां शुरू कर दी | अकबर ने उनसे मित्रता करनी चाही लेकिन प्रताप अपने संकल्प पर अडिग रहें | उदयपुर को असुरक्षित समझकर प्रताप ने जनता को कोमलमीर की घाटी में चला जाने का आदेश दिया तथा खुद साथियों के साथ कोमलमीर दुर्ग में पहुंच गए |

Pratap kept this pledge till his death, when the Sardars agreed, Pratap started preparations to fight with Akbar. Akbar wanted to befriend him but Pratap remained firm on his resolve. Considering Udaipur as unsafe, Pratap ordered the public to move to the valley of Komalmir and along with his companions reached Komalmir Durg.

सम्राट अकबर ने अपने दो लाख की सेना को सलीम के नेतृत्व में राणा प्रताप का दमन करने के लिए भेजा | सेना के साथ मानसिंह, शक्तिसिंह भी गए | महाराणा प्रताप और मानसिंह की सेनाओं के बीच “हल्दीघाटी” में भीषण युद्ध हुआ | प्रताप बड़ी बहादुरी से लड़े उन्होंने मानसिंह और सलीम पर भाला का प्रहार किया लेकिन वे दोनों बच गए |

Emperor Akbar sent his army of two lakhs under the leadership of Salim to suppress Rana Pratap. Mansingh and Shaktisinh also accompanied the army. There was a fierce battle between Maharana Pratap and Mansingh’s forces in “Haldighati”. Pratap fought with great bravery, hitting the spear at Mansingh and Salim, but both of them survived.

इधर मुसलमान सिपाहियों ने प्रताप को घेर लिया लेकिन उन्होंने साहस नहीं छोड़ा और लड़ते ही रहे | झाला के राणा मानसी ने देखा कि प्रताप घायल तथा थके हुए हैं तो उसने प्रताप के सिर के छात्र को अपने ऊपर रख लिया तथा प्रताप को सुरक्षित स्थान पर जाने को कहा | झाला राणा को प्रताप समझकर मुसलमान सैनिकों ने उसे मार डाला |

Here the Muslim soldiers surrounded Pratap but he did not give up courage and kept fighting. Rana Mansi of Jhala saw that Pratap is injured and tired, so he kept Pratap’s head student on himself and asked Pratap to go to a safe place. Considering Jhala Rana as Pratap, the Muslim soldiers killed him.

राणा प्रताप को सुरक्षित स्थान की तरफ जाने में 2 मुसलमान सैनिक अवसर उनके पीछे हो लिए यह दृश्य शक्ति से भी देख रहा था उसने दोनों अफसरों को रास्ते में मार दिया तथा प्रताप से क्षमा मांगी | प्रताप को सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के बाद उनके घोड़ा चेतक ने दम तोड़ दिया | हल्दी घाटी के युद्ध में प्रताप के 22000 सैनिकों में अधिकांश मारे गए तथा महाराणा प्रताप पराजित हुए |

2 Muslim soldiers took the opportunity to follow Rana Pratap towards safe place, he was also seeing this with visual power, he killed both the officers on the way and apologized to Pratap. After reaching Pratap’s safe place, his horse Chetak died. Most of Pratap’s 22000 soldiers were killed in the battle of Haldi valley and Maharana Pratap was defeated.

Maharana Pratap

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद राणा प्रताप के तीन बड़ी कठिनाइयों में बीते | उनके परिवार को जंगली फल, फूल व घास की रोटियां द खानी पड़ी | इन कष्टों को झेलकर भी उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की |

After the battle of Haldighati, Rana passed into three great difficulties of Pratap. His family had to eat wild fruits, flowers and grass loaves. Even after facing these sufferings, he did not accept the subjection of Akbar.

1 दिन में राणा प्रताप पूर्वजों का मंत्री भामाशाह ने प्रताप को 25 हजार मोहरे भेंट की | यह ध्यान की मदद से प्रताप ने भीलो तथा राजपूतों की विशाल सेना तैयार की | अबे पुन: मुगलों से युद्ध होने लगे | कई वर्षों में धीरे-धीरे महाराणा प्रताप ने 22 किलो जीत लिए |2 किलो जीतने से रह गए |इनके अलावा सारा मेवाड़ राज्य जीत लिया |

In 1 day, Rana Pratap ancestor minister Bhamashah presented 25 thousand pieces to Pratap. With the help of this meditation, Pratap prepared a huge army of Bhilos and Rajputs. Abe again started fighting with the Mughals. Over the years, gradually Maharana Pratap won 22 kg. He kept on winning 2 kg. Apart from this he won the whole of Mewar state.

महाराणा प्रताप ने से आसन पर बैठते समय चित्तौड़ किले को जीतने की प्रतिज्ञा की थी | महाराणा प्रताप चितौड़ को अपनेअधिकार में लाने के प्रयत्न में थे सन 1597 ने उन्हें मृत्यु ने आ घेरा |

Maharana Pratap had pledged to win the Chittor Fort while sitting on the pedestal. Maharana Pratap was trying to bring Chittor under his control, in 1597, death surrounded him.

मरते समय बेटा मर से को बुलाकर चित्तौड़ को आजाद कराने को कहा हम अरसे से बच्चन लेने के बाद उनकी आत्मा स्वर्ग सिधार गई | राणा प्रताप ने अपने 25 वर्ष के शासनकाल में ऐसी कीर्तिदेर से निकलेगा फैलाई जो देश काल की सीमा को पार कर अमर हो गई |

At the time of dying, the son was called from the dead and asked to liberate Chittor. After taking Bachchan for a long time, his soul went to heaven. Rana Pratap, during his 25-year rule, would emerge from such a fame that crossed the boundary of the country period and became immortal.

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